बुधवार, 13 जून 2012

अक्सर महसूस करती हूँ मैं,
तुम्हारी खुशबू
अपने आस-पास ,
महक उठता है तन,
पुलकित हो जाता हैं मन,
उस परिचित सी सुगंध से ,
सिहर सी जाती हूँ मैं,
जब याद आता  है किसी का पहला स्पर्श ,
गर्मी का खुश्क  महीना भी
 जैसे बन जाता है ,
बारिश का सा मौसम ,
लगता है जैसे
चुरा लिया हो,
किसी ने मुझको मुझसे ही,
साधिकार किया हो प्यार,
दे दिया हो जीवन भर को
 स्मृतियों का उपहार।


तुम्हारी कोई भी चीज़
 गुम नहीं की है मैंने,
तुमसे जुडी हर याद  को मैंने,
संजो कर रख लिया है दिल में,
यहाँ तक की,
तुमसे अलग होने के बाद,
तुम्हारी याद में बिताये हुए,
हर पल को भी,
मेने सहेज कर रख लिया है,
कविताओ के रूप में,
क्योंकि तुम्हारी याद  भी तो,
तुम्हारी ही चीज़ है।






















वक़्त गुज़रता जा रहा है,
 यादें धुंधली होती जा रही हैं,
 दूरियां बढती  जा रही हैं,
 मुमकिन है यादो की  भीड़  में,
तुम भूल जाओ मेरा चेहरा भी,
में बन कर रह जाऊं ,एक धुंधली तस्वीर ,
मेरी आवाज तक तुम्हे याद  न रहे,
लेकिन वक़्त कितना भी गुज़र जाये,
कितनी भी दूरियाँ  आ जाये,
में नहीं भुला पाऊंगी तुम्हे,
तुम्हारे साथ बीता हर एक पल
 मुझे  ऐसे याद  है जैसे कल ही की बात हो,
तुम्हारी कही हुई  हर एक बात,
 मुझे आज भी याद  है ,
और आगे भी रहेगी
तुम्हे याद  रहे न रहे।









कैसे  कह दूं कि  ,
तुम मेरे पास नहीं हो,
जबकि दुःख के हर छण में,
मैंने  महसूस की है
 तुम्हारी उपस्थिति अपने पास,
अपने दिल के बहुत करीब,
कैसे कह दूं कि ,
 तुमने मेरा साथ नहीं दिया,
जबकि कितनी ही बार
अवचेतन रूप में,
तुमने पोंछे  हैं मेरे आंसू,
लगाया है मुझे गले,
कैसे कह दूं कि  भूल चुकी हूँ तुम्हे,
जबकि हर पल रहता है
तुम्हारा ही चेहरा,
 मेरी आँखों के आगे,
कैसे कह दूं कि  जी  लूंगी,
 मैं  तुम्हारे बिन,
जबकि तुम्हारे बिना जीने की
कल्पना तक नहीं की है,
 आज तक मैंने ,
कैसे कह दूं कि ,
 अलग अलग हैं,
 हम दोनों के जीवन,
जबकि तुम्हारे बिना,
  ये जीवन लगता है
 कितना अर्थ हीन ,
अधूरा सा,
कसे कह दूं कि  नहीं है,
 तुम्हारा इंतजार मुझे,
जबकि आज भी नहीं छोड़ा  है,
 मेरी आँखों ने ,
तुम्हे लेकर सपने देखना,
 भविष्य के।


जी चाहता है ,
कि  एक बार ,
जोर से हंस पडूँ  खुद पर,
आखिर क्यों यकीं हो चला था मुझे तुम पर,
और तुम्हारी बातों  पर,
 और सोचने लगी थी मैं,
 की अगर जिन्दगी में कभी ,
जलना पड़ा मुझे ग़मों की  धूप में,
तो भाग कर छुप  जाऊंगी तुम्हारे साये तले ,
और बचा लोगे तुम मुझे ,
ग़मों की तपिश से,
अपने प्यार की शीतलता देकर,
लेकिन कभी सोचा न था,
की मुझे गमो की धूप में जलता देखकर,
तुम छुप जाओगे कहीं जाकर,
और दूर से देखोगे मुझे ,
जलती हुई झुलसती हुई।


क्यों छीनते  हो खुद को,
क्यों दूर ले जा रहे हो,
अपने आपको मुझसे,
जबकि मृत्यु  तैयार  है हर पल,
अलग करने के लिए हमें,
एक दुसरे से,
सदा के लिए।


क्या ये वही आँखे हैं,
जिनमें नज़र आती  थी,
मेरे लिए कितनी चाहत ,
एक शोखी एक शरारत,
कुछ न कह कर भी,
जो कह देती थी बहुत कुछ,
जेहन की तह में उतर जाने वाली ,
वो दो गहरी और स्नेहिल आँखें,
इन दो जोड़ी आँखों का उठाना,
उठ कर मिलना,
मिल कर झुकना ही तो थी हमारी मौन भाषा,
फिर आज  जाने क्यों ये इतनी अजनबी हो गयी,
 शायद ये पहचान नहीं पा रही हैं  इन  आँखों को ,
 जिनमे  काजल की जगह ले ली  है आंसुओं ने,
लेकिन आंसुओं से धुल कर भी,
मिट नहीं पाई है, तुम्हारी तस्वीर,
इन आँखों से,
तुम  चाहे न करो सामना ,
लाख चुराओ नज़र,
लेकिन फिर भी ढूँढती  रहेंगी मेरी आँखें,
वही तुम्हारी प्यार भरी नज़र।